- दिल्ली कैबिनेट ने 'कार्बन क्रेडिट' पॉलिसी को मंज़ूरी दे दी है। जानिए इस फैसले से क्या फायदे होंगे?

दिल्ली कैबिनेट ने 'कार्बन क्रेडिट' पॉलिसी को मंज़ूरी दे दी है। जानिए इस फैसले से क्या फायदे होंगे?

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने 'कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन फ्रेमवर्क' लागू करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है। इस पहल को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दिल्ली सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा फैसला लिया है। मंगलवार को हुई कैबिनेट मीटिंग में पर्यावरण विभाग द्वारा लाए गए 'कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन फ्रेमवर्क' को लागू करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी गई। इस फ्रेमवर्क के तहत, दिल्ली सरकार अब अपने अलग-अलग ग्रीन प्रोजेक्ट्स से होने वाले एमिशन में कमी को इंटरनेशनल मार्केट में बेचकर रेवेन्यू कमाएगी।

अतिरिक्त रेवेन्यू के सोर्स
इस 'कार्बन क्रेडिट मोनेटाइजेशन फ्रेमवर्क' को लागू करने से सरकार को अतिरिक्त रेवेन्यू के सोर्स मिलेंगे, जिनका इस्तेमाल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए किया जाएगा। यह सरकारी योजना न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगी, बल्कि इससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल भी डेवलपमेंट के कामों में किया जाएगा।

पर्यावरण विभाग होगा नोडल विभाग
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग के अनुसार, इस योजना में अलग-अलग सरकारी विभागों द्वारा की गई पहल शामिल होंगी। इस पूरी प्रक्रिया के लिए पर्यावरण विभाग नोडल विभाग होगा। दिल्ली सरकार अभी कई ऐसी पहल कर रही है जो कार्बन एमिशन को कम करती हैं, जैसे इलेक्ट्रिक बसें चलाना, बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना, सोलर एनर्जी को बढ़ावा देना और वेस्ट मैनेजमेंट।

प्रदूषण में कमी को वैज्ञानिक तरीके से मापा जाएगा
इस नई पॉलिसी के तहत, इन सभी गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण में कमी को वैज्ञानिक तरीके से मापा जाएगा और 'कार्बन क्रेडिट' के रूप में रजिस्टर किया जाएगा। इन क्रेडिट्स को फिर नेशनल और इंटरनेशनल कार्बन मार्केट में बेचा जा सकता है, जिससे दिल्ली सरकार के लिए रेवेन्यू जेनरेट होगा।

फाइनेंशियल मॉडल इसकी मुख्य खासियत है
इस योजना की सबसे बड़ी खासियत इसका फाइनेंशियल मॉडल है। दिल्ली सरकार का पर्यावरण विभाग एक ट्रांसपेरेंट टेंडर (RFP) प्रक्रिया के ज़रिए एक एक्सपर्ट एजेंसी का चुनाव करेगा। यह एजेंसी पहचानेगी कि कौन सी योजनाएं कार्बन क्रेडिट जेनरेट कर सकती हैं। इसके बाद यह इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के अनुसार सभी डॉक्यूमेंटेशन और रजिस्ट्रेशन का काम संभालेगी। यह पूरी प्रक्रिया 'रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल' पर आधारित होगी, जिसका मतलब है कि सरकार को इस पर कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। कमाई का एक बड़ा हिस्सा सरकार के खजाने में जाएगा।

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